जनसत्याग्रह मार्च 2012 क्या है ?

जनसत्याग्रह मार्च 2012 एक बड़ा अहिंसक पदयात्रा अभियान है, जो अक्टूबर 2012 में भारत और कई अन्य देशों में चलाया जाएगा। यह संयुक्त राष्ट्र के अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस 2 अक्टूबर को शुरू होकर एक माह तक जारी रहेगा। भारत में मुख्य समारोह आयोजित किया जा रहा है, जहां एक लाख लोग विभिन्न ग्रामीण समुदायों, विशेष रूप से आदिवासी, भूमिहीन और छोटे किसानों का प्रतिनिधित्व करते हुए एक समूह के रूप में ग्वालियर (ताजमहल के पास) से दिल्ली तक 350 कि.मी. एक साथ चलेंगे। लोग इस मुद्दे को उठाएंगे कि विकास करने और गरीबी मिटाने के लिए भूमि, एक महत्वपूर्ण परिसंपत्ति है और सकारात्मक राष्ट्रीय एवं वैश्विक विकास प्राप्त करने के लिए उच्च स्तर पर भूमिहीनता और अभावों में कमी लाने की अति आवश्यकता है। भूमि और आजीविका का अधिकार सभी लोगों की आजादी के लिए सहायक और प्रभावी होते हैं। 

जनसत्याग्रह मार्च 2012, गांधीजी के 1930 के नमक सत्याग्रह पर आधारित है जो दांडी मार्च के नाम से जाना जाता है। यह आंन्दोत्सव वातावरण के साथ ही उत्थानात्मक घटना है। अपने बुनियादी अधिकारों को प्राप्त करने के लिए यह लोगों का एक संयुक्त प्रयास है और यह शासन प्रणाली में और अधिक सभ्यता निर्माण की बात करता है। ’मार्च 2012‘ अहिंसक रूप से कार्य करने वाले लोगों का अनुशासित संगठन है, जो लोगों के बड़े समूह को एक साथ लाने का एक प्रयास है ताकि ग्रामीण भारत की ताकत के साथ कृषि और खाद्यान उत्पादन के महत्व का प्रदर्शन किया जा सके जो कि नगरीय भारत और सभी लोगों के भाग्य निर्माण के लिए एक आधार प्रदान करता है। 

जनसत्याग्रह ’मार्च 2012‘ क्यों आयोजित किया जा रहा है ?

जनसत्याग्रह ’मार्च 2012‘ कई कारणों से आयोजित किया जा रहा है। भारतीय उपमहाद्वीप में बड़ी संख्या में लोग सीमांत है। भूमि से संबंधित शिकायतों के साथ ही किसानों द्वारा आत्महत्या की घटना भी हर दिन बढ़ती जा रही है। सिलसिलेवार सरकारें गरीबी के समाधान के रूप में, उद्योगों और कल्याण कार्यक्रमों (जैसे मनरेगा के अंतर्गत 100 दिनों का रोजगार) को विशेष रूप से बढ़ावा दे रही है और वह लोगों को अस्तित्व के लिए बुनियादी साधन उपलब्ध कराने में नाकाम है। केवल भूमि और आजीविका निर्माण द्वारा ही वास्तविक रूप से गरीबी को दूर किया जा सकता है। भारत में कई नेता अक्सर गरीबी उन्मूलन के बारे में बात करते हैं, लेकिन इस समस्या के समाधान हेतु कार्य नहीं करते, क्योंकि इसके लिए भूमि के वितरण की व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता है। भूमि सुधार की भाषा कानूनों और नीतियों में पाया जाता है, लेकिन सरकार भूमि सुधारों को व्यावहारिक रूप से अपनाने को तैयार नहीं है। जो भूमि कानून लागू किये जा रहे हैं, वह गरीब समर्थक नहीं है, अपितु वे केवल उन लोगों के लिए हैं जिनके पास और अधिक धन उत्पन्न करने के लिए धन है। आदिवासी जनजातीय समूह, छोटे किसान और भूमिहीन लोग या तो इसे ऐसे ही स्वीकार कर विनम्रतापूर्वक आत्मपालन करते रहे या वे सरकार की प्राथमिकताओं को चुनौती दें। 2012 का मार्च सरकार की उन संरचनाओं को चुनौती देने तैयार किया गया है, जो भारत के एक बड़े गरीब वर्ग के लिए कार्य नहीं कर रही, किन्तु अल्पसंख्यक धनवान वर्ग के लिए काम कर रही है। 


’मार्च 2012‘ का निर्माण जनादेश 2007 के अनुभवों पर आधारित है। भारत में आयोजित अबतक के सबसे बड़े फुटमार्च (पदयात्रा) जनादेश 2007 में पाया गया कि न केवल बहुत सारी मांगे प्राप्त हुई, बल्कि उन्हें सरकार द्वारा स्वीकृत भी किया गया। सरकार भूमि सुधार नीति बनाने और फिर इसे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में लागू करने के लिए सहमत भी हुई। परन्तु वास्तव में बाद के कुछ महीनों में मीडिया कव्हरेज में आयी कमी के बाद, अपने वादों को पूरा करने के सरकारी प्रयासों में अत्यधिक कमी देखी गई। भूमि मुद्दों पर काम करने के बजाए सरकार सामाजिक आंदोलनों की वैधता के खिलाफ लड़ाई करने में अधिक प्रयासरत थी। इसने जनसत्याग्रह मार्च 2012 को शुरू करने के लिए एकता परिषद के संकल्प को और सुदृढ़ किया।